Tantra Mantra Yoga Guru

नासनं सिद्धसदृशं न कुम्भसदृशं बलम्। न खेचरीसमा मुद्रा न नादसदृशो लयः।। सिद्धासन के समान कोई आसन नहीं , कुम्भक के समान कोई बल नहीं , खेचरी के समान कोई मुद्रा नहीं और नाद के समान कोई लय नहीं ।

Saturday, March 08, 2008

हमें एक ऐसा समाज चाहिए जिसमें कन्या भ्रूण हत्या न हो, एक भी बच्चा अशिक्षित न रहे

हमें एक ऐसा समाज चाहिए जिसमें कन्या भ्रूण हत्या न हो, एक भी बच्चा अशिक्षित न रहे ।

Saturday, September 22, 2007

राम और रामायण

चलो, अब कुछ संकर जाति के लोगो ने यह कहना शुरु कर दिया है कि राम नहीं हैं, अगर राम नहीं हैं, जिनके अस्तित्व के सबसे ज्यादा प्रमाण हैं तो फिर अन्य देवी देवता और अवतार कभी भारत में हुए ही नहीं और हिन्दु धर्म का कोइ अस्तित्व ही नहीं । तो हिन्दुओ, अपना टाट कमडंल उठाओ और इस इन्डिया छोड़ भाग क्योंकि अब भारत और हिन्दूस्तान का कोई अस्तित्व नहीं है । और अगर तुम्हे ये बातें बुरी लग रही तो उठो, जागो और इस देश को हिन्दु राष्टर् घौषित करो ।

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Thursday, August 09, 2007

शिव स्तुति

नमामिशमीशान निर्वाण रूपं।
विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं।।
निजं निर्गुणं निर्किल्पं निरीहं।
चिदाकाशमाकाशवासं भजेहं।।
निराकारमोंकारमूलं तुरीयं।
गिरा ज्ञान गोतीतमीशं गिरीशं।।
करालं महाकाल कालं कृपालं।
गुणागार संसारपारं नतोहं।।
तुषाराद्रि संकाश गौरं गंभीरं।
मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं।।

रामचरितमानस

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Friday, March 30, 2007

ध्यान


ध्यान कोई तन्त्र-मन्त्र नहीं है। मन को बाहर से भीतर की ओर ले जाना और उसे विचारों के स्रोत्र से मुक्त कर देना ही 'ध्यान' हैं। ध्यान मन की एकाग्रता नहीं है, बल्कि मन को भीतरी चेतना के साथ जोड़ना है। ध्यान एक साधना है, जिसके द्वारा हम अपने भीतर आत्मानन्द उपजाते हैं। केसर सब स्थानों पर उत्पन्न नहीं होता है; उसके लिए उपयुक्त स्थान खोजना होता है तथा एक विशेष पद्धति अपनाकर अथक परिश्रम करना होता है। हमें आत्मानंद उपजाने के लिए भी प्रयत्न (साधना) करना होगा। ध्यान-साधना आत्मानन्द-प्राप्ति का एक साधन है। ध्यान सम्पूर्ण मन के मौन के द्वारा उस अवस्थान्तर प्राप्त होने का साधना है, जो बुद्धि-ग्राह्य नहीं है। ध्यान के द्वारा मन अपने संचित ज्ञान एवं अनुभव से अथवा बौद्धिक स्तर से ऊपर उठ जाता है। यह स्थिति कोई रिक्तता अथवा शून्यता नहींहै, बल्कि बुद्धि के व्यापार से मुक्त होकर उस से परे सूक्ष्म चेतना के सागर में प्रवाहित होना है, जो कि स्थूल जगत् के परे है। ब्रह्मसूत्र में "ध्यानाच्च" का भाष्य करते हुए शंकर कहते हैं कि एक प्रत्यय करना ही ध्यान होता है।आध्यात्मिक भूमिका में यह प्रवाह परमानन्द का प्रवाह है

यो गुरुः स शिवः प्रोक्तो

यो गुरुः स शिवः प्रोक्तो यः शिवः स गुरुः स्मृतः।
उभयोरन्तरं नास्ति गुरोरपि शिवस्य च।।
यतो न वेदा मनसा सहैनमनप्रविशन्ति ततोऽथमौनम्।
यत्रोत्थितो वेदशब्दस्तथायं स तन्मयत्वेन विभाति ।।

योगसन, स्वच्छता, स्नानादि से शरीर पुष्ट एवं शुद्ध होता है। यद्यपि उनका ध्यान-क्रिया से कोई सीधा संबंध नहीं है, तथापि उनका एक महत्व है। यम, नियम का पालन करने पर आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार को अभ्यास करने पर धारणा की अवस्था प्राप्त होती है। धारणा ध्यान की पूर्वावस्था है और ध्यान का परिपाक समाधि है। (समाधि की विभिन्न प्रक्रियाएं, आत्मा का प्रक्षेपण इत्यादि, सिद्ध गुरु के निर्देशन में ही करना चाहिए ।

Sunday, February 19, 2006

Sadgurudev

He epitomises true knowledge, all the sciences and total divinity. He is the Supreme Soul. Music has emanated from his voice. And it is He who incarnates in the form of Ram and Krishna. The name of Swami Sachchidanand is the greatest Mantra and a symbol of Totality.

Obstacles For a Sadhak

It is necessary for a new initiate in the world of Sadhanas not to be frustrated or lose hope by the initial failures. This is a wonderful article for the new Sadhaks which they shall find really heartening and encouraging.

All Sadhanas and spiritual practices have a particular sequence and process. Till all rules are not followed success in Sadhanas remains doubtful. Sometimes success remains elusive to a Sadhak even after hard work. This could be due to the bad Karmas of one's past lives,

Sometimes we also see evil and corrupt individuals earning respect, fame and wealth in life. On the other hand those devoted to the Lord are seen suffering from pain and sorrow.